अमेरिका द्वारा अपनाई गई नई टैरिफ नीति, जिसे रेसिप्रोकल टैरिफ कहा जा रहा है, केवल बाकी देशों के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका के लिए भी एक गंभीर चुनौती बन गई है। राष्ट्रपति ट्रंप का दावा था कि अमेरिका जिन देशों से व्यापार करता है, अगर वे अमेरिका पर टैरिफ लगाते हैं, तो अमेरिका भी उन्हें उसी अनुपात में जवाब देगा। परंतु वास्तविकता में यह नीति उलटी पड़ती दिख रही है।
भारत से अमेरिका में निर्यात होने वाले उत्पादों पर पहले न्यूनतम या शून्य टैक्स लगता था। जैसे भारत से निर्यात होने वाले सेब पर कोई टैक्स नहीं लगता था और वह अमेरिका में सस्ती दरों पर बिकते थे। लेकिन अब यदि अमेरिका इन पर 26% टैरिफ लगाता है, तो वही सेब अमेरिकी बाजार में महंगे हो जाएंगे, जिससे आम उपभोक्ता की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। जो व्यक्ति पहले ₹100 में सेब खरीदता था, अब उसे ₹126 खर्च करने होंगे। यह सीधा प्रभाव अमेरिका की खुद की जनता पर पड़ेगा, जिससे महंगाई बढ़ेगी, जीवन यापन की लागत (कॉस्ट ऑफ लिविंग) में इज़ाफा होगा और संभवतः मंदी का खतरा भी उत्पन्न हो सकता है।
गोल्डमैन सैक्स जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी बैंक ने भी चेतावनी दी है कि इस टैरिफ नीति से अमेरिका में आर्थिक मंदी का खतरा 20% से बढ़कर 35% तक पहुंच सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था 15% तक आयात पर निर्भर है। अगर आयात महंगा होता है और घटता है, तो अमेरिका की उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी।
राष्ट्रपति ट्रंप ने हालांकि फार्मास्यूटिकल्स, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा स्रोतों और कीमती धातुओं पर टैरिफ नहीं बढ़ाया, क्योंकि अमेरिका खुद इन उत्पादों पर निर्भर है। यह निर्णय खुद अमेरिका की मजबूरी का संकेत है, न कि किसी देश पर किया गया उपकार।
भारत और अमेरिका के व्यापार समीकरणों को देखें तो भारत अमेरिका से हर साल ₹49,000 करोड़ का सामान खरीदता है, जबकि अमेरिका भारत से ₹64,000 करोड़ का सामान खरीदता है। यानी अमेरिका को भारत से लगभग ₹15,000 करोड़ का व्यापार घाटा होता है। चीन के मुकाबले यह घाटा कम है, क्योंकि चीन से अमेरिका को हर साल ₹26 लाख करोड़ का घाटा होता है। पूरी दुनिया से अमेरिका का व्यापार घाटा लगभग ₹80 लाख करोड़ है, जिसे ट्रंप कम करना चाहते हैं।
भारत, अमेरिका से तेल और हथियार खरीदकर यह घाटा संतुलित करना चाहता था, लेकिन अमेरिका संतुष्ट नहीं हुआ और भारत पर भी टैरिफ लगा दिया। इससे भारत के इलेक्ट्रॉनिक, जेम्स एंड ज्वेलरी और कृषि क्षेत्र पर गहरा असर पड़ेगा। जैसे कि तमिलनाडु और कर्नाटक की इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों को अमेरिका में ऑर्डर मिलने बंद हो सकते हैं, जिससे वहां नौकरी की छंटनी हो सकती है। सूरत और महाराष्ट्र के आभूषण उद्योग पर भी असर होगा। साथ ही भारत के किसान, जो फल, सब्जी, चावल और अन्य अनाज अमेरिका को भेजते हैं, अब उन्हें भी नुकसान होगा, क्योंकि उनके उत्पाद अमेरिका में महंगे होकर बिकेंगे।
वहीं, अमेरिका का तर्क है कि भारत जैसी अर्थव्यवस्थाएं उसकी कारों पर भारी टैक्स लगाती हैं – जैसे 70% टैक्स – जिससे अमेरिका की कारें भारत में महंगी हो जाती हैं और नहीं बिकतीं। इसके विपरीत, भारत की कारें अमेरिका में लगभग शून्य टैक्स पर बिकती हैं। इससे भारत को व्यापार में फायदा होता है।
भारत ऐसा इसलिए करता है ताकि अपनी घरेलू कंपनियों को सुरक्षा मिल सके और देशी उद्योग बढ़ सके। यही कारण है कि भारत विदेशों से आने वाले सामान को महंगा करता है और अपनी कंपनियों के उत्पादों को सस्ता रखता है, ताकि उपभोक्ता देशी उत्पाद ही खरीदें।
टैरिफ की इस जंग का सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ता है। यह केवल व्यापार नीति नहीं, बल्कि सीधा जनता के जीवन, रोजगार और खर्च से जुड़ा मामला है। इससे कंपनियों की आय प्रभावित होती है, नौकरियां घटती हैं और वैश्विक व्यापार में अस्थिरता पैदा होती है।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि अमेरिका द्वारा फैलाया गया टैरिफ का यह जाल केवल दूसरों के लिए नहीं, बल्कि खुद अमेरिका के लिए भी एक संभावित संकट बन सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप की यह नीति अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक नुकसान का कारण बन सकती है, और इसका सबसे बड़ा असर अमेरिका की अपनी जनता और कंपनियों पर ही पड़ेगा।
