तेहरान पश्चिम एशिया में वाशिंगटन की रक्षा क्षमता को नाकाम साबित करने पर तुला है, खासकर सहयोगियों की मदद न कर पाने को लेकर। ईरान का दावा है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों से ही उसके मिनाब क्षेत्र के एक स्कूल पर हवाई हमला हुआ, जिसमें 168 लड़कियां मारी गईं। इसी तरह, खार्ग द्वीप पर हुए प्रहार में भी UAE ने अमेरिका को सहायता दी।UAE से ईरान की खफगी का एक प्रमुख कारण 2020 का अब्राहम समझौता है। इस डील के बाद UAE ने तेल अवीव को आधिकारिक मान्यता दी, दोनों देशों ने प्रत्यक्ष राजनयिक संबंध स्थापित किए और UAE ने इजरायल को अपना दूतावास स्थापित करने की अनुमति प्रदान की। पहले खाड़ी के इस्लामी राष्ट्र तेल अवीव को कट्टर शत्रु मानते थे, लेकिन UAE ने इस रिवायत को चुनौती दी। परिणामस्वरूप, दुबई पर हालिया आक्रमणों की संख्या बढ़ गई है।पश्चिम एशिया में UAE और बहरीन पहले राष्ट्र थे जिन्होंने इजरायल को स्वीकार किया। तेहरान और तेल अवीव इसे विश्वासघात के समान मानते हैं। इजरायल-मुस्लिम राष्ट्रों का वैमनस्य धार्मिक आधार पर टिका है, जो धार्मिक संघर्ष का रूप ले चुका है। तेल अवीव और गाजा पट्टी के बीच 78 साल पुराना टकराव जारी है, जिसमें अधिकांश इस्लामी राष्ट्र गाजा का साथ देते हैं और इजरायल को प्रमुख विरोधी ठहराते हैं। वर्तमान में यरूशलेम का अल-अक्सा स्थल इजरायल के अधीन है, जिसे वैश्विक 2 अरब मुसलमान इस्लाम के प्रमुख तीर्थों में गिनते हैं। इजरायल-अरब राष्ट्रों के बीच युद्धों का लंबा सिलसिला रहा है—पिछले 78 वर्षों में पांच प्रमुख जंगें हो चुकी हैं। फिलहाल तेहरान-तेल अवीव टकराव भी धार्मिक रंग लिए हुए है।ईरान के लिए इजरायल शीर्ष शत्रु है, और UAE की उसके साथ नजदीकी ने नाराजगी को चरम पर पहुंचा दिया। इसलिए तेहरान दुबई पर प्रहारों से UAE को सबक सिखाने को बेताब है। एक अन्य बड़ा कारण यमन का दस साल पुराना आंतरिक संघर्ष है, जहां ईरान हूती बागियों का बैकिंग कर रहा है, जबकि UAE आधिकारिक सरकार के पक्ष में खड़ा है। पश्चिम एशिया में वर्चस्व की होड़ ने दोनों को आमने-सामने ला खड़ा किया है।
हृदय नारायण की रिपोर्ट