शीशे से बनाया सोना: कैसे विज्ञान ने असंभव को मुमकिन किया
1700 के दशक में पोलैंड के सम्राट ऑगस्ट द स्ट्रांग ने एक युवा वैज्ञानिक, जोहान फ्रेडरिक बॉटगर को एक अजीब-सा कार्य सौंपा—कृत्रिम रूप से सोना बनाना। बॉटगर ने कई पुराने शास्त्रों और विधियों का सहारा लिया, लेकिन सफल न हो सके। तीन शताब्दियों बाद, यूरोप की मशहूर वैज्ञानिक संस्था CERN के अनुसंधानकर्ताओं ने वही कर दिखाया, जो बॉटगर नहीं कर सके थे—हालांकि एक बिल्कुल अलग विज्ञान के सहारे।
CERN में स्थित विश्व की सबसे विशाल और शक्तिशाली मशीन, Large Hadron Collider (LHC), में वैज्ञानिकों ने शीशे के रूप में पहचाने जाने वाले लेड (Lead) को कुछ समय के लिए सोने में बदला। यह किसी जादुई प्रक्रिया से नहीं, बल्कि अत्याधुनिक कण भौतिकी के प्रयोग से संभव हो पाया।
वास्तव में लेड और गोल्ड का संबंध पीरियडिक टेबल में बहुत करीब का है। लेड में 82 प्रोटॉन होते हैं जबकि गोल्ड में 79। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि लेड के परमाणु से तीन प्रोटॉन और कुछ न्यूट्रॉन हट जाएं, तो वह सोने में तब्दील हो सकता है। लेकिन यह सरल नहीं है—इसके लिए जरूरी है कि कणों को लगभग प्रकाश की गति से टकराया जाए, जो कि सिर्फ LHC जैसी मशीन से ही संभव है।
जब LHC में लेड के परमाणुओं को 99.9993% प्रकाश की गति से घुमाया गया और उनके बीच उच्च-ऊर्जा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक टकराव कराए गए, तो उनमें से कुछ के न्यूक्लियस में से प्रोटॉन और न्यूट्रॉन अलग हो गए और कुछ अणु अस्थायी रूप से सोने के रूप में तब्दील हो गए।
इस प्रयोग के दौरान, 2015 से 2018 के बीच वैज्ञानिकों ने लगभग 86 अरब सोने के नाभिक बनाए—हालांकि यह मात्रा मात्र 29 पिकोग्राम रही, जो एक ग्राम के ट्रिलियनवे हिस्से के बराबर है। यह सब कुछ मात्र एक सेकंड से भी कम समय में हुआ और फिर वे टुकड़ों में बिखर गए।
विशेष बात यह रही कि वैज्ञानिकों ने इस अत्यंत सूक्ष्म परिवर्तन को कैसे मापा। ALICE (A Large Ion Collider Experiment) नामक परियोजना के वैज्ञानिकों ने ZDC (Zero Degree Calorimeters) डिटेक्टर की सहायता से इन अणुओं से निकलने वाले कणों को रिकॉर्ड किया और परिवर्तन का अध्ययन किया।
इस प्रक्रिया में थैलियम (81 प्रोटॉन) और मरकरी (80 प्रोटॉन) जैसे तत्व भी उत्पन्न हुए, लेकिन सोने का निर्माण सबसे आकर्षक और महत्वपूर्ण रहा।
LHC की क्षमता को लेकर ALICE के प्रवक्ता मार्को वॉन लिववेन ने कहा कि यह मशीन न केवल भारी टकरावों को संभाल सकती है, बल्कि उन बेहद दुर्लभ टकरावों को भी दर्ज कर सकती है जिनमें केवल कुछ ही कण उत्पन्न होते हैं।
अब सवाल उठता है: क्या हम भविष्य में लैब में सोना बना पाएंगे? फिलहाल इसका उत्तर “नहीं” है। इतनी ऊर्जा, तकनीक और लागत के साथ बना यह सोना क्षणभंगुर है और इसका औद्योगिक या व्यावसायिक उपयोग संभव नहीं है। 1 ग्राम सोना बनाने में अरबों रुपये खर्च हो सकते हैं।
तो फिर इस प्रयोग का उद्देश्य क्या था? यह प्रयोग वैज्ञानिकों के लिए एक झलक था कि परमाणु संरचना के भीतर क्या घटित होता है, और न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन जैसी जटिल प्रक्रियाओं को समझने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम था।
LHC, जिसकी लागत करीब 1000 करोड़ रुपये है, न केवल डार्क मैटर और ब्लैक होल जैसे रहस्यों को समझने का जरिया है, बल्कि इससे होने वाले ऐसे प्रयोग पदार्थ विज्ञान और कण भौतिकी की दिशा में नई राहें खोल रहे हैं। -271 डिग्री सेल्सियस तापमान पर काम करने वाली यह मशीन विज्ञान की दुनिया में क्रांति ला रही है।
यह प्रयोग साबित करता है कि विज्ञान की मदद से वह भी संभव हो सकता है जिसे कभी केवल कल्पना माना जाता था।
